मित्रगण

Wednesday, 20 April 2016

                             एक  प्याली  चाय 


 आओ न  साथ  बैठे 

एक प्याली  चाय  पर 

                मिले  हैं  बहुत  दिनों  बाद 

               चलो  बैठे  एक  प्याली  चाय  के  साथ 

सुबह  बरामदे  की  कुर्सी  पर 

गुलमोहर  के पेड़  से  आ  रही  धूप  छन  कर 

लाल  फूलों  के  झूमते  गुच्छे  

तुम्हे  भी  तो  लग  रहें  होंगे  अच्छे 

                             सुलझाने  हैं  कई  उलझने ,यों  ही  नहीं  लगो  समझाने 

                            मैं चुप  रहूंगी  नासमझ  बनकर ,क्यों  तकरार  हो  एक  प्याली  चाय  पर ?

दूर  से  आए  हो  थक  गए  होगे ,कड़क  चाय  बनी  है  साथ  कुछ  और  लोगे ?

अहा, नहीं  है  बरामदे  में  बैठना ,चलो  अन्दर  पसंद  करोगे  कमरे  का  कोई  कोना 

मेज़  सजी  है ,कुर्सी  रखी  है 

हम  तुम  बदल  गए  तो  क्या ,

 यादें  हमारी  वहीं  खड़ी  हैं 

                                चाय  तुम्हारी  ठंडी  हो  गई ,फ्लास्क  में  रखी  थी  काली  हो  गई 

               दूध  वाली  चाय  जो  पीते  हो ,आदत  वही  पुरानी  अपनी  धुन  में  जीते  हो 

बादल  घिरने  लगे  हैं ,धूप  छुपने  लगी  है 

         लाओ  ताज़ी  चाय  फिर  से  बना  दूँ 

        इसी  बहाने  कुछ  पल  तुम्हे  रोक  लूँ 

       चाय  की  प्याली  में  तूफ़ान  उठते  सुना  है 

      चलो  उस  पर  थोड़ा   रोमान्स  ही  कर  लूँ 

                                 कहने  को  तो  बहुत  कुछ  है,शुरू  करूँ  तो  अन्त  कहाँ  है 

                                  चाय  तो  बस  एक  बहाना  है ,तुम्हे  जो  पास  बुलाना  है 

ब्लैक  टी  पियोगे ?

कुछ पल  के  लिए  ही  सही ,अपना  ज़ायका बदलोगे ?

चलो  बहस  हो  जाये  चाय  की  वैरायटी  और  क्वालिटी  पर 

प्लीज , आओ  न 

साथ  बैठे  एक  प्याली  चाय  पर  . 

 

    

  

Thursday, 11 February 2016

 বালুচরে  একা 

সাগর  তটে এক রাশি ঢেউ উথালি পাথালি করে 

মনের গভীরে স্মৃতিগুলি সব আকুলি বিকুলি করে 

বালুচরে একা বসে ঢেউ এর তাল গুনি 

ঝাউবনের  স্তব্ধতায় মর্মর  ধ্বনি   শুনি 

দিন  ঢলে  যায় পাখিগুলি যায়  নিজ নিজ নীড়ে  ফিরে 

  রক্তিম  সাগর  অস্ত  রবিকে  আলিঙ্গন করে 

চলে  গেলে  একা  কাটিয়ে  বাঁধন  মোরে  ফেলে গেলে  একা  বিজনে 

অনেক  কথা  অনেক  ব্যথা  তলিয়ে  আছে মনের   অতল  গহনে 

তোমার  পরশ  জড়িয়ে  বুকে  স্বপ্নের  জাল  বুনি 

না  পাই  ঠাউর  সব  কিছু  ফাঁকা  শুধুই  প্রহর  গুনি 

রাত  পোহালে  রবির  কিরণ  ধরায়ে  ঝিলিক  মারে 

নতুন  দিনের   স্বপ্ন  নিয়ে  গাইব  নতুন  সুরে   


                                                     


                                                              আজ  আমার  জামাইবাবুর   দ্বিতীয়  পুন্যাতিথি  তাঁকে  আমার  

শ্রাধাঞ্জলি  জানাই   দিদির  কথা  মনে  করে  এই  কবিতা  সমর্পিত                    

Saturday, 2 January 2016

শুভ নববর্ষ 

 


জীবন মানেই আশা যাওয়া ,চলছে শুধুই বোঝা পড়া 
হাঁসি কান্নার আনা গোনা,নাইকো কারুর আসতে মানা 
সময়ে চলে নিজের ছন্দে ,মানে না সে কারুর শাসন 
কুহুর কুজন বুলবুলের  গান ,মুক্তাকাশে মনের উড়ান 
জীবনের এই শুষ্ক মরুতে ,অশ্রু শিক্ত মনের  রূদন 
  কুল ছাপিয়ে বাঁধ ভাঙিয়ে ,ছিন্ন হউক বেড়ির বাঁধন 
ঝর ঝর  নির্ঝরিণীর ঝরা ,কল কল বহে নদীর ধারা 
কুল ভেঙ্গে যায়ে আবার গড়ে ,নদ নদী বহে  আপন তালে 
দিনে রাতে চলছে তারা,  নেইকো তাদের পেছন ফেরা 
রবি শশী পোষিত এই ধরাতে ,মন উড়ে যায় পাগল পারা 
দিন ফুরালো রাত জুড়ালো , নতুন রবির প্রাচীর আলো 
  স্বপ্ন দেখো স্বপ্ন  বোনো , চলার পথে এগিয়ে চলো 
নাই বা পেলে মনের চাওয়া ,যা আছে তা কম কি পাওয়া 
 প্রেমের ভাষায়ে প্রেমের  আশায়ে ,সিঞ্চিত হউক মলীন ধরা 
নতুন সুরের আকুল তানে ,বাজাও মনের একতারা 
হিমেল হাওয়ার নিবিড়   ছোওয়া , হিয়ার মাঝে স্মৃতির দোলা 
দিন বয়ে যায়ে মাস কেটে যায়ে ,ভাঙ্গা গড়ার চলছে খেলা 
খোল খোল ভাই মনের দুয়ার ,উছলে উঠুক  খুশির জোয়ার 
 ভালবাসার আলো দিয়ে , উজ্জল হউক প্রানের পরশ 
মুছিয়ে ফেল মনের তমস ,বরণ কর নতুন বরষ 
  


Thursday, 24 December 2015

बाती  की  आत्मकथा 

 लोग  कहतें  हैं  दीपक जलता है  पर जलती मैं हूँ बाती 
किसे सुनाऊ मैं अपनी पीड़ा किसे सुनाऊ आप बीती 
जब पेङों पर मेरा दुधिया रूप हवा  के हिचकोले लेता 
 मंद मंद मुस्काता किसान और व्यापारी  खुश हो जाता 
मैं बिचारी डाली से टूट बोरे में बंधा  जाता 
तब मुझे मालूम   न था तकली की सूली पर चढ़ना होता 
किसी तरह जुलाहे से बचकर इधर उधर बच जाती हूँ 
अम्मा दादी या बिटिया के हाथों छोटे टुकड़ो  मेँ बँट जाती हूँ 
 अंतिम संस्कार से पहले मुझे तेल से नहलाया जाता 
फिर दिये में रखकर  मुझमे आग लगाया जाता 
कभी बनूँ आरती की बाती 
कभी कफ़न का साथी 
या किसी गरीब की 
कुटिया   में उजाला बाँटती 
जैसे शमा पाता है  काजल उजाला बाँटकर 
वैसे तपकर मैं खुश  होती जग से अँधियारा  दूर कर 
छोटी सी ये मेरी   काया 
दूर भगाता तम का घेरा 
 और फिर जल जल कर 
खाक में तब्दील हो जाता 

  

Monday, 7 December 2015

सुख दुःख का ताना बाना है जीवन दोनों संग संग चलते
एक दूजे के बिना  अधूरे निभाते आजीवन रिश्ते
सुख दुःख चलते दायें बाएं सम्मुख चलता पथ का प्रमाद
ऐसी इनकी महीन बुनावट चाह कर भी न कर सकते अलग
सुख की बगिया में दुःख के कांटे जीवन का सफर संवारते
जैसे मीठे में नमक की चुटकी नमक मीठे की स्वाद बढ़ाते 
उदास के क्षणों में उजास ढूंढ़ते रहे
जिंदगी कोहरे में लिपटी जाड़े की सुबह हो गयी
रिश्तों के महीन बुनावट के कुछ धागे ऐसे उलझ गए
उन्हें सुलझाने में आधी उम्र गुजर गयी
मंज़िल की आस में कदम बढ़ते ही रहे
अनुभवों की दीवार और लम्बी हो गयी
उत्सवों की आड़ में मुस्कुराने की वजह
बेवजह संवेदना को उद्वेलित कर गयी
अर्थहीन प्रयासों के अर्थ ढूंढ़ते रहें
मिलन के क्षण रहे अधूरे वियोग संपूर्ण हो गयी
शब्दों के आडम्बर में निर्णय का असफल प्रयास
अभिव्यक्ति की वाचालता में जिंदगी और उलझ गयी 

Tuesday, 17 November 2015

THE SILENT NIGHT
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The night is silent dark and deep
Keep me awake far from sleep
Lovely crescent hanging afar
Reigning among the blinking stars

I wade through my turbulent mind
Grope around like a blind
The strings of yesteryear s are broken
And pearls of memoirs are strewn around.

Silhouette of palm tree near window sill
Sways its shadow when in breeze
Rustling of leaves whisper in my ear
The depth of night says 'come my dear'.

A shooting star in the sky above
Ripples my mind and makes me wry
The humble night says I'm here to stay
Till the dawn pushes me away.