मित्रगण

Monday, 7 December 2015

उदास के क्षणों में उजास ढूंढ़ते रहे
जिंदगी कोहरे में लिपटी जाड़े की सुबह हो गयी
रिश्तों के महीन बुनावट के कुछ धागे ऐसे उलझ गए
उन्हें सुलझाने में आधी उम्र गुजर गयी
मंज़िल की आस में कदम बढ़ते ही रहे
अनुभवों की दीवार और लम्बी हो गयी
उत्सवों की आड़ में मुस्कुराने की वजह
बेवजह संवेदना को उद्वेलित कर गयी
अर्थहीन प्रयासों के अर्थ ढूंढ़ते रहें
मिलन के क्षण रहे अधूरे वियोग संपूर्ण हो गयी
शब्दों के आडम्बर में निर्णय का असफल प्रयास
अभिव्यक्ति की वाचालता में जिंदगी और उलझ गयी 

1 comment:

  1. उत्सवों की आड़ में मुस्कुराने की वजह
    बेवजह संवेदना को उद्वेलित कर गयी
    अर्थहीन प्रयासों के अर्थ ढूंढ़ते रहें

    बहुत सुंदर

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