मित्रगण

Thursday, 24 December 2015

बाती  की  आत्मकथा 

 लोग  कहतें  हैं  दीपक जलता है  पर जलती मैं हूँ बाती 
किसे सुनाऊ मैं अपनी पीड़ा किसे सुनाऊ आप बीती 
जब पेङों पर मेरा दुधिया रूप हवा  के हिचकोले लेता 
 मंद मंद मुस्काता किसान और व्यापारी  खुश हो जाता 
मैं बिचारी डाली से टूट बोरे में बंधा  जाता 
तब मुझे मालूम   न था तकली की सूली पर चढ़ना होता 
किसी तरह जुलाहे से बचकर इधर उधर बच जाती हूँ 
अम्मा दादी या बिटिया के हाथों छोटे टुकड़ो  मेँ बँट जाती हूँ 
 अंतिम संस्कार से पहले मुझे तेल से नहलाया जाता 
फिर दिये में रखकर  मुझमे आग लगाया जाता 
कभी बनूँ आरती की बाती 
कभी कफ़न का साथी 
या किसी गरीब की 
कुटिया   में उजाला बाँटती 
जैसे शमा पाता है  काजल उजाला बाँटकर 
वैसे तपकर मैं खुश  होती जग से अँधियारा  दूर कर 
छोटी सी ये मेरी   काया 
दूर भगाता तम का घेरा 
 और फिर जल जल कर 
खाक में तब्दील हो जाता 

  

1 comment:

  1. छोटी सी ये मेरी काया
    दूर भगाती तम का घेरा
    और फिर जल जल कर
    खाक में तब्दील हो जाती

    बहुत ख़ूब !

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