मित्रगण

Thursday, 24 December 2015

बाती  की  आत्मकथा 

 लोग  कहतें  हैं  दीपक जलता है  पर जलती मैं हूँ बाती 
किसे सुनाऊ मैं अपनी पीड़ा किसे सुनाऊ आप बीती 
जब पेङों पर मेरा दुधिया रूप हवा  के हिचकोले लेता 
 मंद मंद मुस्काता किसान और व्यापारी  खुश हो जाता 
मैं बिचारी डाली से टूट बोरे में बंधा  जाता 
तब मुझे मालूम   न था तकली की सूली पर चढ़ना होता 
किसी तरह जुलाहे से बचकर इधर उधर बच जाती हूँ 
अम्मा दादी या बिटिया के हाथों छोटे टुकड़ो  मेँ बँट जाती हूँ 
 अंतिम संस्कार से पहले मुझे तेल से नहलाया जाता 
फिर दिये में रखकर  मुझमे आग लगाया जाता 
कभी बनूँ आरती की बाती 
कभी कफ़न का साथी 
या किसी गरीब की 
कुटिया   में उजाला बाँटती 
जैसे शमा पाता है  काजल उजाला बाँटकर 
वैसे तपकर मैं खुश  होती जग से अँधियारा  दूर कर 
छोटी सी ये मेरी   काया 
दूर भगाता तम का घेरा 
 और फिर जल जल कर 
खाक में तब्दील हो जाता 

  

Monday, 7 December 2015

सुख दुःख का ताना बाना है जीवन दोनों संग संग चलते
एक दूजे के बिना  अधूरे निभाते आजीवन रिश्ते
सुख दुःख चलते दायें बाएं सम्मुख चलता पथ का प्रमाद
ऐसी इनकी महीन बुनावट चाह कर भी न कर सकते अलग
सुख की बगिया में दुःख के कांटे जीवन का सफर संवारते
जैसे मीठे में नमक की चुटकी नमक मीठे की स्वाद बढ़ाते 
उदास के क्षणों में उजास ढूंढ़ते रहे
जिंदगी कोहरे में लिपटी जाड़े की सुबह हो गयी
रिश्तों के महीन बुनावट के कुछ धागे ऐसे उलझ गए
उन्हें सुलझाने में आधी उम्र गुजर गयी
मंज़िल की आस में कदम बढ़ते ही रहे
अनुभवों की दीवार और लम्बी हो गयी
उत्सवों की आड़ में मुस्कुराने की वजह
बेवजह संवेदना को उद्वेलित कर गयी
अर्थहीन प्रयासों के अर्थ ढूंढ़ते रहें
मिलन के क्षण रहे अधूरे वियोग संपूर्ण हो गयी
शब्दों के आडम्बर में निर्णय का असफल प्रयास
अभिव्यक्ति की वाचालता में जिंदगी और उलझ गयी